Thursday, October 28, 2010

काला पत्थर

वह अब भी 
कमर पर बांधता है 
बैटरी
और माथे पर लैम्प 
धरती के सीने को चीर
जाता है ६०० फुट नीचे रोज
जहाँ रात और दिन में
नहीं होता फर्क

उसकी पत्नी 
बारह घंटे 
आज भी
नहीं हंसती
साँसे नहीं लेतीं
उसके लौट आने तक
बच्चों की आँखें 
सूनी  रहती हैं उस दौरान 
और टिकी रहती है
दरवाजे की  सांकल पर

उसके नथुने में
भरा होता गर्द कोयले का
काला स्याह 
थोडा होता है बारूद
जिससे ढीली की जाती है
धरती की कसावट 
निकालने को कोयला

सुना है
दिन फिरने वाले  है
बम्बई में कुछ रिकार्ड टूटे हैं
उनकी कंपनी द्वारा 
बहुत धन जुटाया गया है
देश विदेश से 
लेकिन
सूरज कहाँ निकलता है
कोयले के धुंए के बादलों की ओट से 
सूचकांक के बढ़ने से 
नहीं होती कोई हलचल 
इस तरफ
यहाँ तो रोज ही चीरना है
धरती की छाती

इनकी सूनी आँखों को 
सुना जा सकता है बोलते 
'ब्लैक डायमंड तो बस काला पत्थर है हमारे लिए' 

16 comments:

  1. उनकी पत्नियां
    बारह घंटे

    ---

    शायद ऐसा कहना था...

    उसकी पत्नी
    बारह घंटे


    ...पूरी कविता एकवचन में व्यक्ति विशेष को संबोधित कर रही है पूरे तबके के बिम्ब के तौर पर, तब उपरोक्त खटकता है.

    वैसे एक बात और बैटरी बांधता तो कमर पर ही है, टंगी कहीं भी रहे..शायद कमर कहने से काम चल जाता...तो बेवजह भरती का गैरजरुरी शब्द न आता....

    मेरे व्यक्तिगत विचार हैं वैसे भावों की जमीन पर बहुत उम्दा रचना...

    कृप्या अन्यथा न लें.

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  2. ओह!! अब ध्यान गया कि यह आपकी यहाँ प्रथम प्रविष्टी है.

    बहुत बहुत स्वागत मित्र. नियमित लिखें. अनेक शुभकामनाएँ.

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  3. स्वागत।
    समीर भाई (उड़न तश्तरी) बहुत सीनिय्रर और वरिष्ठ ब्लॉगर हैं। उनकी सलाह पर ध्यान देंगे।
    भाव और पृष्ठभूमि का चयन उत्तम है।

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  4. .

    हकीकत से रूबरू कराती एक सुन्दर रचना ।

    स्वागत है आपका !

    .

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  5. @ sameer bhai/manoj jee evam zeal jee

    bahut bahut dhanyawad mere blog par padharne ke liye aur apna bahumulya sujhav dene ke liye...
    saadar
    kumar palash

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  6. hmmm!!

    koyle khadan ke majdooro ke yatharth ko sahejne ke liye dhanyawad sweeekaren!!
    dil ko chhuti rachna...!

    I m d first follower of ur blog....:)
    ab barabar aana parega!!:)

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  7. स्वागत है ब्लॉग जगत में ...पहली रचना ही बहुत अच्छी ..कोयला खादानो में काम करने वाले मजदूर की और उसके परिवार की पीड़ा को कहती हुई ....सुन्दर अभिव्यक्ति


    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  8. "लेकिन
    सूरज कहाँ निकलता है
    कोयले के धुंए के बादलों की ओट से
    सूचकांक के बढ़ने से
    नहीं होती कोई हलचल
    इस तरफ
    यहाँ तो रोज ही चीरना है
    धरती की छाती

    इनकी सूनी आँखों को
    सुना जा सकता है बोलते
    'ब्लैक डायमंड तो बस काला पत्थर है हमारे लिए' "... बहुत सुन्दर कविता... मन को छू गई.. बहुत गहराई से अध्यनन किया है आपने कोयला मजदूरो के जीवन को.. कोल इन्डिया के आईपीओ पर भी प्रहार है.. ब्लाग जगत मे स्वगत है...

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  9. इनकी सूनी आँखों को
    सुना जा सकता है बोलते
    'ब्लैक डायमंड तो बस काला पत्थर है हमारे लिए'.....

    बहुत ही सार गर्भित रचना. पहली ही कविता मूल विषय पर.....क्या बात है . शुभकामना.

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  10. kumar bhai aapni kala patthar film ki yaden taja kar din. lik se alag hat kar likhi gayi ye kavita vakai sarahniy hai. congrats

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  11. Ek majdoor ke jeevan ki kaheekat bayaan karti hai aapki rachna ... bahut maarmik ...

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  12. पलाश जी ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है। पक्‍के तौर पर यह आपकी पहली कविता तो नहीं होगी। हां यहां ब्‍लाग पर पहली कविता है। आपने जो विषय लिया है या उसका जो अवलोकन किया है वह अछूता है। बिम्‍ब और भाव लिए हैं वे भी अनूठे हैं। फिर भी एक बात कहूंगा कि कविता शिल्‍प के लिहाज से कमजोर पड़ रही है। अपने अनुभव से एक सुझाव दूंगा कि कविता में आए शब्‍दों को आगे पीछे रखकर देखें। कविता को एक पाठक के नजरिए से पढ़कर भी देखें। देखें कि कौन से ऐसे शब्‍द हैं जिनके नहीं होने से भी कविता में कोई अंतर नहीं आता। उन्‍हें हटा दें। यह अभ्‍यास करके देखें। निश्चित ही आपको लाभ होगा। शुभकामनाएं।

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  13. पलाश जी ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है।
    बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  14. सबसे पहले ब्लोग जगत मे आपका स्वागत है।
    एक बेहद उम्दा प्रस्तुति और जो बाकी ब्लोगर्स ने कहा उस पर भी ध्यान दीजियेगा………………ये रचना बहुत कुछ कह गयी।

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  15. स्वागत .. बहुत सुन्दर रचना
    दर्द और मर्म को बखूबी उकेरा है, समीर जी की बातें ध्यान देने योग्य हैं.
    पुन: स्वागत

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  16. धमाके दार शुरुआत...राजेश उत्साही जी की बातें गाँठ बाँध लें..लेखन में बहुत काम आयेंगीं...

    नीरज

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