Thursday, January 27, 2011

विष्णुगढ़ से हजारीबाग के बीच दहक रहा है पलाश


(झारखण्ड राज्य का एक महत्वपूर्ण शहर है हजारीबाग जो कि अपने एतिहासिक सेन्ट्रल जेल, कोलंबस कालेज के लिए प्रसिद्द है. हजारीबाग के चारो तरफ भयंकर गरीबी पसरी है और फलस्वरूप नक्सलवाद भी. विष्णुगढ़ एक छोटा सा क़स्बा है हजारीबाग से कोई ५० किलोमीटर दूर. इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर एक नज़र कविता के माध्यम से ) 




पलाश की 
विशाल छाया से ढकी 
५० किलोमीटर की यह दूरी
जो है विष्णुगढ़ से हजारीबाग के बीच 
वास्तव में उतनी ही दूरी है जितनी 
तथाकथित लोकतंत्र में है 
लोक और सत्ता के बीच 
मनोरम दिखने वाली यह सड़क 
अपने भीतर पाले है आग
 लाल टुह टुह आग 

राज्य मार्ग संख्या तो नहीं पता 
लेकिन इतना पता है कि 
इस ५० किलोमीटर के रास्ते से 
गुजरती है कई बरसाती नदियाँ  
और सैकड़ो गाँव जहाँ बाकी है
पहुंचना  पानी, बिजली, दवा
हां, अंग्रेजी दारु की दुकानें 
गाँव गाँव खुल गई हैं 
जिनके नंबर पता है
आज हर युवा को. 

कुछ बैंक की शाखाएं हैं 
इस सड़क पर  जो खुली थी 
देने को किसानो को सस्ते दरों पर ऋण 
उनके सीढीनुमा खेतों में उगाने  को 
धान, दलहन, सब्जियां 
लेकिन जिनके तन को मिला नहीं कपडा 
दीवारों को मिली नहीं छत 
कहाँ से मिलती 'सिक्योरिटी' 
सो बैंक बस नाम के रह गए 
नामचीन लोगों के लिए 

इस सड़क से कोई बीस किलोमीटर है 
एक गाँव जहाँ से चलती है  'बुधिया ' 
मुंह अँधेरे लेकर तेंदू पत्ता 
हजारीबाग के लिए हर रोज़  
पहले देती है जंगल पुलिस को कुछ सिक्के 
कई बार सिक्को के साथ मांगी जाती है देह भी 

फिर धनबाद और बगोदर से आने वाली
खचाखच भरी बस के ऊपर 
चढ़ जाती है लादे तेंदू पत्ते की गठरी अपने सिर पर 
दुकान दुकान फिरती है 
देती है पत्ते ठेलों वालों को , चाय वालों को, जलेबी वालों को 
और वापसी  में लाती है 'हावड़ा बीडी', 
चाँद तारा मार्का गुल धोने को मुंह 
जेबकतरों से बचाने के लिए ब्लाउज में छुपा लेती है 
अपनी छोटी कमाई 

पता है उसे पत्तल के दिन लद रहे हैं 
विस्थापित हो रहे हैं
प्लास्टिक के पत्तलों और दोनों से 
फिर भी ठठा कर हँसते हुए लौटती है 
उसी बगोदर या धनबाद वाली बस से 

विष्णुगढ़ और हजारीबाग के बीच 
कितनी ही बुधिया बेटी से माँ, माँ से दादी बनी 
लेकिन बदली कहाँ दिनचर्या 
हां हजारीबाग में जरुर 
छोटी दुकाने बन गई हैं बड़ी
दुकाने जो बड़ी थी
अब डिपार्टमेंटल  स्टोर बन गईं है 

थक कर बुधिया 
जंगल पुलिस से, 
थाने से, 
बस कंडक्टर से , 
पत्तल खरीदने वाले दुकानदारों और साहूकारों से 
थाम ली है लाल झंडा 
विष्णुगढ़ और हजारीबाग के बीच
दहक रहा है पलाश 

17 comments:

  1. waah.ise kahate hain apane samay ko kahatee kavitaa

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  2. pls contact me at apnimaati.com@gmail.com

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  3. समसामयिक प्रस्तुति के लिये आभार।

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  4. kitna dhyan se aap chhoti chhoti baato ko apni kavita me sahejte ho....bahut khubsurat...:)

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  5. सार्थक और भावप्रवण रचना।

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  6. गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !!

    Happy Republic Day.........Jai HIND

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  7. देखें, हालात कब बदलते हैं.

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  8. पलाश तुम्हारी यह कविता मुझे कोई पंद्रह साल पीछे ले कर गई है जब मैं धनबाद से हजारीबाग अपने विश्वविद्यालय जाता था .. क्या चित्र खिंचा है आपने .. सुन्दर कविता.. आपको ढेरों शुभकामना !

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  9. इस लम्‍बी कविता की पंक्तियां माला के मोती की तरह परस्‍पर मिली और जुड़ी है । कविता खण्‍डो में विभाजित नहीं है, पूरी की पूरी एक ही रौ में लिखी है ।

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  10. bahut achha aur saarthak lekhan, badhai sweekaaren.

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  11. इत्तफाक़ से तेंदु पत्ते और पत्तलों दोनों को करीब से देखा है, झारखण्ड न सही रेणुकूट में रहकर.. क्या वर्णन किया है आपने वहाँ की अर्थव्यवस्था का.. बरसाती नदियों का जल और उसमें बहती शराब!!
    लाल अंगूर की बेटी और लाल झण्डा!! करुण व्यथा!!

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  12. PALSH JI DHANYWAD AAPKO. AAP JIWAN-TATTWA KO AASANI SE KAVITA KA ROOP DETE HAIN, YE APKE HI BAS KI BAAT HO SAKTI HAI.
    HALAT BADLE YA NA BADLE, ISKI WYARTH CHINTA HAMEN TO KARNI HI NAHI CHAHIYE AUR ISKI UMID BHI NAHI, LEKIN HAMARE ACHARN MEN IMANDARIPURN SARTHAK BAATEN TO JHALKNI HI CHAHIYE, JO AAPKI KAVITA MEN JHALKTI HAI.
    PUNAH DHANYWAD AAPKO. WAISE MAINE APNI PATRIKA drishtipat MEN AAPKI EK KAVITA Jharia ko december mah men prakashit kiya hai, LEKIN AFSOS KI MAIN AAPKA PATA NAHI JANTA, AAPKO BHEJ NAHI PAA RAHA HOON
    MERA MOBILE NUMBER HAI-9471760495, 9031975537. AAP CHAHEN TO SAMPARK KAR SKTE HAIN, MUJHE ATYANTA PRASANNTA HOGI

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  13. प्रिय पलाश,
    विष्णुगढ़ से हजारीबाग के बीच ५० किलोमीटर की यह "दूरी"
    वास्तव में तथाकथित लोकतंत्र मे लोक और सत्ता के बीच आज तक बनी हुई है और यही सारे फसाद की जड़ है.आज सत्ता है और उसे पाने की होड़ है.जन-प्रतिनिधि की अवधारण लगभग मृतप्राय हो चुकी है. आज इसे गरीबों का अमीर देश तक कहा जाता है.जबतक हमारे नेता,अधिकारी और व्यापारी भ्रष्ट रहेंगे और तंत्र उनकी सहायता करता रहेगा तबतक ये खाई बनी रहेगी और औरतों, मर्दों और बच्चों को दो वक्त की रोटी केलिये संघर्ष करना पड़ेगा .
    लाल झंडे फहराते रहेंगे ,विद्रोह के स्वर उठाते रहेंगे.देश की आधी से अधिक आबादी इस तंत्र की अनदेखी का शिकार है .आपने बहुत मार्मिक तरीके से इस मुद्दे को अपनी रचना के माध्यम से हमतक पहुँचाया इसके लिए धन्यवाद.

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  14. Bahut vidrohi rachna hai ... aakosh ki khushboo aa rahi hai is lajawaa rachna mein ... gahri sanvednayen .... bahut bahut badhaai is prastuti ke liye ...

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  15. कितनी ही बुधिया बेटी से माँए माँ से दादी बनी
    लेकिन बदली कहाँ दिनचर्या
    हां हजारीबाग में जरुर
    छोटी दुकाने बन गई हैं बड़ी

    सर्वहारा वर्ग की व्यथा को स्वर देती अच्छी रचना।

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