Saturday, December 4, 2010

यह शोक मानाने का समय है दामोदर

(दामोदर नदी को कभी बंगाल का शोक कहा जाता था. बंगला में इसे दमुदा भी कहते थे. दामू का तात्पर्य पवित्र और डा का अर्थ जल है.. लेकिन दामोदर में अब ना तो जल है ना यह पवित्र रही. अब बंगाल के बड़े हिस्से में दशको से बाढ़ नहीं आयी क्योंकि दामोदर में नहीं रहा जल. इसलिए बंगाल के बड़े हिस्से में धान की खेती प्रभावित हो रही है. अस्तित्वहीन होते दामोदर को समर्पित यह कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है )














दामोदर
नहीं रहे तुम 
अब शोक-नदी 
क्योंकि प्रवाह में तुम्हारे
नहीं है बल 
ना ही धारा में
रहा जल 

बराकर 
कोनार
बोकारो
जमुनिया
हहारो 
ये कुछ नदिया थीं 
जो बनाती थी
तुम्हारा अस्तित्व
लुप्त हो रही हैं आज स्वयं 
वे क्या देंगी तुम्हे
अस्तित्व 
शोक मनाओ तुम 

अब बाढ़ नहीं लाते तुम
बंगाल के शोक नदी भी नहीं रहे
लेकिन पूछो वर्दमान के पीले पड़े खेतो से
दशक बीत गए
बदली नहीं मिटटी
लाये जो नहीं तुम बाढ़ 
तुम्हारे तट पर
अब नहीं होती तुम्हारी प्रार्थना
नहीं मांगते लोग
तुमसे नाव पार करने को रास्ता
तुम्हरे ऊपर बने पुलों की नीव
दिखने लगी है दामोदर

अब तुम 'दामुदा' नहीं कहे जाते 
नहीं जो रहे तुम दामू (पवित्र) 
न ही रहा तुम में दा (जल) 
बाँध कर तुम्हे 
कहा गया था
होंगे प्रकाशमान
गाँव, पहाड़, खेत खलिहान
नारों में रह गए
सब के सब
हरियाली जहाँ पसारने का
दिया गया था सपना
आज लाल ही लाल है
माटी/पहाड़/झार 

यह शोक मानाने का समय है
दामोदर/क्योंकि नहीं रहे तुम
नदी- अविभाजित बंगाल के शोक

27 comments:

  1. हरियाली जहाँ पसारने का
    दिया गया था सपना
    आज लाल ही लाल है
    आपकी चिंता वाजिव है ...शुक्रिया
    बहुत अच्छा लगा अआपके ब्लॉग पर आकर ...शुभकामनायें

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  2. यही हाल पटना में गंगा का है... और दिल्ली में जमुना का!! जल जो न होता तो ये जग जाता जल, तो अब दिखेंगे वही जले हुए धान के खेत!! जब हम स्वयम अपनी पहचान मिटाने पर लगे हैं तो दोष किसको दें!!

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  3. आज अधिकतर नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं तथा सिमट रही हैं। दुखद एवं चिंता का विषय है ये।

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  4. आज यही हाल होता जा रहा है सभी जगह नदियों का…………बेहद चिंतनीय्।

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  5. आज यही हाल होता जा रहा है सभी जगह नदियों का…………बेहद चिंतनीय्

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  6. आज यही हाल होता जा रहा है सभी जगह नदियों का…………बेहद चिंतनीय्

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  7. Arvind Kumar to me
    "bahut sunder palsh ji.....suder abhivyakti..
    arvind"

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  8. rajiv kumar to me

    "अब नहीं होती तुम्हारी प्रार्थना
    नहीं मांगते लोग
    तुमसे नाव पार करने को रास्ता
    तुम्हरे ऊपर बने पुलों की नीव
    दिखने लगी है दामोदर"
    दामोदर के अतीत से वर्तमान तक के वर्णन के सहारे आपने समाज के बदलते(या फिर कहिये की मरते )सरोकारों,मरती संवेदनाओं का जो चित्रण किया है वह मानव की संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा है .आपने अनायास ही मुझे एलोइत के" Waste Land " में लाकर खड़ा कर दिया है.इसमें छिपी व्यथा को आज सिर्फ कवि मन ही समझ सकता है.क्योंकि अपने आस-पास को देखकर महसूसता है.सलिल जी से मैं पूर्ण सहमत हूँ.मैं भी दिल्ली में २० वषों से यमुना को तिल-तिल कर मरते देख रहा हूँ .इसे मानव जीवन की बिडम्बना ही कहेंगे कि वो कालीदास की तरह जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है नहीं जनता कि अंततः गिरकर घायल वही होगा . मुझे अब पूरा-पूरा विश्वास हो चला है कि इस संवेदनशून्य एवं अंधे समाज को एक रचनाकार ही झकझोर सकता है क्योंकि वही उसका भविष्य काफी पहले देख पाता है.लाजवाब प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.
    राजीव

    प्रिय पलाश, आपका ब्लॉग खुल नहीं रहा है .कारण भी समझ नहीं आ रहा है.इसलिए यहाँ टिप्पणी दे रहा हूँ.

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  9. बेहद चिंतनीय विषय है ये।

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  10. बेहद चिंता का विषय है...

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  11. पर्यावरण के प्रति जागरूख करती कविता ... स्वागत है

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  12. ब्लागजगत में आपका स्वागत है. शुभकामना है कि आपका ये प्रयास सफलता के नित नये कीर्तिमान स्थापित करे । धन्यवाद...

    आप मेरे ब्लाग पर भी पधारें व अपने अमूल्य सुझावों से मेरा मार्गदर्शऩ व उत्साहवर्द्धऩ करें, ऐसी कामना है । मेरे ब्लाग जो अभी आपके देखने में न आ पाये होंगे अतः उनका URL मैं नीचे दे रहा हूँ । जब भी आपको समय मिल सके आप यहाँ अवश्य विजीट करें-

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    और एक निवेदन भी ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आवे तो कृपया उसे अपना समर्थन भी अवश्य प्रदान करें. पुनः धन्यवाद सहित...

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  13. अच्छी कविता जो सामयिक प्रश्नों को भी सामने रखती है।

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  14. कमो बेश यही हाल है नदियों का हर जगह

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  15. नदियों को नाला बना दिया है हम लोगों ने ...
    शोक का समय तो है ही !

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  16. सोच को झाक्जोरती आपकी रचना अभूत प्रभाव शाली है...यदि नदियों का येही हाल हम करते रहे तो भविष्य में क्या होगा भगवान ही जाने...मेरा एक शेर है:--
    इक नदी बहती कभी थी जो यहाँ
    बस गया इंसा तो नाली हो गयी.

    नीरज

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  17. प्रिया पलाश आपकी कविता पढ़ कर दामोदर नदी का तट याद आ गया.. अत्यदिक खनन, खदानों को भरने के लिए रेत की जरुरत को पूरा करने के लिए नदी का दोहन, कई सारे छोटे बड़े बाँध के कारण यह नदी मर रही है.. बढ़िया कविता है आपकी.. शुभ कामना सहित ...

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  18. प्रकृति से आपका जुडाव प्रशंसनीय होने के साथ साथ आपके ह्रदय की स्निग्धता को भी दर्शाता है. शुभकामना

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  19. पर्यावरण चिंता को रेखांकित करती बेहतरीन कविता.

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  20. nadiyon ki ye durdasha sarvatra ek si hai....damodar ab apani hi durdasha par shok mana raha hai....vicharniya....

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  21. लगभग कई नदियों का यही हाल है..छोटी नदियों का तो विकास एकदम रुक सा पड़ा है बस बरसात में ही नदी मालूम पड़ती है...रचना के माध्यम से एक सशक्त भाव प्रस्तुत किया है आपने... भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई

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  22. ब्रह्मपुत्र और सोन के बाद शायद यही तीसरी महत्‍वपूर्ण नदी, नहीं नद है, पुल्लिंग जलधारा.

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